🔊
पितृपक्ष में श्रद्धा के साथ करें तर्पण, पिंडदान और पंचबली, आचार्य प्रकाश कृष्ण शास्त्री ने बताए श्राद्ध कर्म के नियम, सात्विक आहार और परंपराओं का महत्व।
लोहाघाट। सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष अवसर माना गया है। मान्यता है कि इस अवधि में पितरों का स्मरण कर विधि-विधान से तर्पण और श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पुराणों के मर्मज्ञ एवं प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य प्रकाश कृष्ण शास्त्री ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म के कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस अवधि में प्रतिदिन तर्पण करना तथा निर्धारित तिथि पर पिंडदान करना शुभ माना जाता है। पिंड बनाने के लिए सामान्यतः पके हुए चावल, दूध और तिल का प्रयोग किया जाता है। पिंड को पितरों के शरीर का प्रतीक माना गया है।
उन्होंने बताया कि पितृपक्ष में विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के बजाय नियमित पूजा-पद्धति को जारी रखना चाहिए। इस दौरान सात्विक जीवनशैली अपनाने और तामसिक भोजन से परहेज करने की परंपरा है। लहसुन, प्याज और मांसाहार का सेवन न करने के साथ ही नए वस्त्र तथा अनावश्यक नई वस्तुओं की खरीद से भी बचने की मान्यता है।
श्राद्ध के दिन सात्विक भोजन तैयार किया जाना चाहिए। जिस पितर का श्राद्ध किया जा रहा हो, उनकी पसंद के अनुरूप भोजन बनाने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करने पर वे सूक्ष्म रूप में घर आकर भोजन ग्रहण करते हैं और परिवार को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
आचार्य शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध कर्म में पंचबली का भी विशेष महत्व है। इसके अंतर्गत गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं तथा चींटियों के लिए भोजन अर्पित किया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचबली का आशय किसी भी प्रकार की पशु हिंसा से नहीं है, बल्कि जीव-जंतुओं के प्रति करुणा और भोजन साझा करने की परंपरा से है।
श्राद्ध और तर्पण के बाद पुरोहित को भोजन कराकर दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा करने की परंपरा है। यदि किसी कारणवश ब्राह्मण भोजन ग्रहण नहीं कर पाते हैं तो उन्हें सीधा प्रदान किया जाता है। इसमें दाल, चावल, चीनी, नमक, मसाले, सब्जियां और फल आदि दिए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध कर्म पूर्ण होने के बाद परिवार को अपने पितरों से क्षमा याचना करनी चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए कि जाने-अनजाने हुई किसी भी त्रुटि को क्षमा कर वे परिवार पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।
फोटो कैप्शन : कथावाचक आचार्य प्रकाश कृष्ण शास्त्री।