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हाटकालिका मंदिर, गंगोलीहाट- यहां हुआ था आदि शंकराचार्य का अहंकार नाश- गंगोलीहाट महाकाली मंदिर में शुरू हुआ ग्यारह दिवसीय शिव महापुराण यज्ञ
गंगोलीहाट (पिथौरागढ़), 25 जुलाई 2025:
उत्तराखंड के आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विश्व प्रसिद्ध हाटकालिका मंदिर, गंगोलीहाट में आज से ग्यारह दिवसीय महाशिव पुराण ज्ञान यज्ञ का भव्य शुभारंभ हुआ। मंदिर परिसर और समूचे गंगावली क्षेत्र में श्रद्धा, भक्ति और दिव्यता का अद्भुत संगम देखा जा रहा है।
शुभारंभ अवसर पर गणेश पूजन व महाकाली माता का पंचामृत अभिषेक किया गया। इसके पश्चात क्षेत्र की सैकड़ों महिलाओं ने ऐतिहासिक जान्हवी नौले से जल भरकर मंदिर तक भव्य कलश यात्रा निकाली। मुख्य यजमान देव सिंह रावल को सपत्नीक आचार्य किशोर चंद्र जोशी द्वारा वैदिक विधि-विधान से पूर्वांग कर्म, व्यास पूजा, मंडप पूजन आदि करवाए गए।
शिव पुराण कथा का शुभारंभ, श्रद्धालुओं का जनसैलाब
दोपहर दो बजे से प्रारंभ शिव कथा में कथा व्यास आचार्य किशोर चंद्र जोशी ने शिव आराधना, शिव महिमा, ब्रह्मा-विष्णु की जिज्ञासा, एवं चंचला के उद्धार आदि प्रसंगों पर विस्तृत व्याख्यान दिया। कथा श्रवण हेतु गंगोलीहाट सहित पूरे कुमाऊं मंडल से श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। मंदिर समिति द्वारा बैठने, भोजन व प्रसाद की सुव्यवस्थित व्यवस्था की गई है।
गंगोलीहाट - जहां आदि शंकराचार्य का भ्रम टूटा
हाटकालिका मंदिर से जुड़ी अद्वितीय मान्यता के अनुसार, यही वह स्थान है जहां आदि गुरु शंकराचार्य को महाशक्ति महाकाली के रूप का साक्षात्कार हुआ था और उनका शिव-प्रधान दर्शन शक्ति के आगे झुक गया था।
कहा जाता है कि जब शंकराचार्य इस स्थान की शक्ति साधना व नरबलि परंपरा को “आसुरी” बताकर आगे बढ़े, तो स्वयं महाकाली ने एक 9 वर्षीय कन्या के रूप में उनकी अंगुली थामी और मंदिर से कुछ दूर जाकर उनका साथ छोड़ दिया। उसी क्षण शंकराचार्य शक्तिहीन होकर भूमि पर गिर पड़े, और देव्यपराध क्षमापन स्तोत्र की रचना कर मां की क्षमा याचना की।
माता ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और तभी से शंकराचार्य ने मंदिर के उग्र रूप को शमित कर, श्रीयंत्र की स्थापना कर मंदिर में व्यवस्था स्थापित की। इसी के बाद से रावल उपजाति के पुजारियों को महाकाली सेवा में नियुक्त किया गया।
ऐतिहासिक घटनाएं और यज्ञ परंपरा
सन 1978 में श्री 108 नागा बाबा शंकर गिरी जी द्वारा सर्वप्रथम सहस्त्र चंडी यज्ञ कराया गया, जिसमें अस्कोट राजवंश के सदस्य यजमान बने।
वर्ष 2000 में दो बार सहस्त्र चंडी यज्ञ का आयोजन हुआ, जिसमें शंकराचार्य माधवाश्रम, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, एवं भगत सिंह कोश्यारी जैसे गणमान्य शामिल हुए।
वर्तमान में नरेंद्र सिंह रावल की अध्यक्षता में जंगम बाबा आश्रम समिति यज्ञ आयोजनों का संचालन कर रही है।
रावल परिवारों का योगदान, सजीव परंपराएं
रावल बारीदारों द्वारा गठित मंदिर यज्ञ समिति इस आयोजन को ऐतिहासिक परंपराओं के अनुरूप संजोए हुए है। पांडा पुजारी के द्वारा माता को भोग अर्पण, महापूजा, कन्या पूजन, ब्रह्म भोज, और भंडारा आदि नियमित रूप से किए जा रहे हैं।
श्रद्धालु देर रात्रि तक भजन गायन में सहभागी बन रहे हैं। यज्ञ के समापन दिवस 4 अगस्त को पूर्णाहुति के साथ विशाल भंडारे का आयोजन होगा।
गंगोलीहाट - महाशक्ति और महाशिव की तपस्थली
गंगोलीहाट क्षेत्र सरयू व रामगंगा के उद्गम से लेकर रामेश्वर व पनार तक फैली गंगावली भूमि का हिस्सा है। यहां की हर पर्वत-श्रृंखला में महादेव की गुफाएं, महाकाली की विविध शक्तियां एवं नवरात्रि से जुड़ी गाथाएं बसी हैं।
छिन्नमस्तका, चामुंडा, शैलेश्वर महादेव, मडकेश्वर, कोटेश्वर, आदि अनेक स्थल इस क्षेत्र को देवभूमि की साक्षात क्रीड़ास्थली बनाते हैं।
संक्षिप्त जानकारी:
स्थान: हाटकालिका मंदिर, गंगोलीहाट, उत्तराखंड
आयोजन अवधि: 25 जुलाई से 4 अगस्त 2025
कथा व्यास: आचार्य किशोर चंद्र जोशी
मुख्य यजमान: देव सिंह रावल
मुख्य आकर्षण: कलश यात्रा, शिव कथा, कन्या पूजन, भंडारा, भजन संध्या
आयोजक: महाकाली मंदिर समिति व रावल बारीदार परिवार
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