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कथा की बयार के बीच लोकतंत्र का त्योहार, गोरल मैदान कीचड़ से बेहाल, लोकतंत्र फिर भी बेमिसाल
दिनेश चंद्र पांडेय, पत्रकार
चम्पावत उत्तराखंड
उत्तराखंड के बारह जनपदों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के नतीजों का इंतजार अपने चरम पर है। मतगणना की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। जब आप यह खबर पढ़ रहे होंगे, उसी वक्त कहीं न कहीं परिणामों की घोषणा भी शुरू हो चुकी होगी।
चम्पावत जिले में प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के इस विधानसभा क्षेत्र में 31 जुलाई को सुबह 8 बजे से गोरलचौड़ मैदान के समीप वन पंचायत भवन में मतगणना शुरू होगी। कुल 20 टेबलें लगाई गई हैं। आठवें राउंड तक ग्राम पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य के नतीजे साफ हो जाएंगे। उम्मीद की जा रही है कि सायं 7 बजे तक पूरी प्रक्रिया पूर्ण हो जाएगी।
गोरल मैदान की पुकार: लोकतंत्र के बोझ तले दबा इतिहास
चम्पावत के ऐतिहासिक गोरलचौड़ मैदान की दशा इस समय अत्यंत दयनीय है। लोकतंत्र के इस महापर्व में यह मैदान फिर से कीचड़ और अव्यवस्थाओं से जूझ रहा है। जहां एक ओर गोरलदेव मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा से आध्यात्मिक बयार बह रही है, वहीं ठीक पास में लोकतंत्र का उत्सव कीचड़ में सना हुआ है।
गोरलचौड़, कभी गौरवशाली आयोजनों और खेल प्रतिभाओं का गवाह रहा मैदान, आज मानो अपने अस्तित्व पर आंसू बहा रहा हो। मानसूनी कीचड़ से लथपथ यह मैदान एक बार फिर वाहनों और कदमों की मार झेल रहा है। गोरलदेव कोरीडोर योजना के तहत इस मैदान को स्टेडियम में तब्दील करने की योजना जरूर बनाई गई है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई आज भी दलदल से बाहर नहीं निकल पाई है।
कुर्सी की लड़ाई, साख का संघर्ष
इस बार चम्पावत जनपद की 6 जिला पंचायत सीटों में 2 मैदानी और 4 पहाड़ी क्षेत्र की सीटें हैं। बनबसा, टनकपुर, बिरगुल, शक्तिपुर और भंडारबोरा में भाजपा ने अधिकृत प्रत्याशी उतारे हैं, वहीं बनबसा एकमात्र सीट है जहां कांग्रेस ने प्रत्याशी घोषित किया है। धूरा सीट पर चतुष्कोणीय मुकाबला बन गया है, जहां भाजपा के बागी व भीतरघातियों ने गणित बिगाड़ दिया है।
चम्पावत ब्लॉक प्रमुख पद इस बार महिला आरक्षित है, जिससे कई बीडीसी प्रत्याशियों की किस्मत इस चुनाव पर निर्भर हो गई है। हर प्रत्याशी पहली परीक्षा की सफलता के लिए भगवान के दरबार में मन्नतें मांग रहा है।
ग्राम प्रधान सीटों की बात करें तो यहां मुकाबला बेहद कांटे का है। कई सीटों पर हार-जीत का अंतर महज कुछ वोटों का हो सकता है। कुछ स्थानों पर तो बराबरी की भी आशंका है।
परिणामों के बाद की राजनीति
जैसे ही पंचायत चुनाव के नतीजे आएंगे, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पद को लेकर जोड़तोड़ और रणनीति का नया दौर शुरू होगा। संभावित दावेदार सदस्यों को एकजुट करने की कवायद में जुट जाएंगे। गोवा, मुंबई जैसे डेस्टिनेशन प्लान के नाम पर होर्स ट्रेडिंग की चर्चाएं भी हवा पकड़ सकती हैं।