🔊
कागज़ों में बनी दो लाख की पेयजल योजना, घिंघारुकोट के लोग आज भी बूंद-बूंद को तरसे, पंचायत सचिव और बीडीओ की चुप्पी पर उबल रहा आक्रोश-ग्रामीण फिर पहुंचेंगे जिलाधिकारी की चौखट।
चंपावत। जिले के सबसे बड़े विकास खंड पाटी की सांगों ग्राम पंचायत का घिंघारुकोट गांव सरकारी फाइलों में विकास का चमकता हुआ नाम है, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद कड़वी है। यहां लोग सरकार या अधिकारियों से नहीं, बल्कि अपनी ही बदहाल जिंदगी से जूझ रहे हैं। कभी सड़क तो कभी पानी-इन बुनियादी सुविधाओं के लिए वर्षों से सरकारी दफ्तरों की चौखटें घिसते-घिसते ग्रामीण थक चुके हैं। चौबीस वर्ष की प्रतीक्षा के बाद जिलाधिकारी के हस्तक्षेप से सड़क निर्माण की उम्मीद जगी ही थी कि अब पेयजल संकट ने एक बार फिर इस क्षेत्र को सुर्खियों में ला दिया है। अगस्त 2025 में एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने डीएम मनीष कुमार के “क्विक एक्शन” के लिए मशहूर जन-सुनवाई में दशकों पुरानी पेयजल योजना को ठीक कराने की गुहार लगाई थी। लेकिन विभागीय अधिकारियों ने “एक परिवार के लिए योजना नहीं बन सकती” कहकर मामला रफा-दफा कर दिया। यहीं से भ्रष्टाचार की परतें खुलनी शुरू हुईं।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता नंदू पाण्डेय ने ग्रामसभा के विकास कार्यों की जांच शुरू की, तो खुलासा हुआ कि जिस पेयजल योजना के लिए डीएम से गुहार लगाई गई, उसी योजना का निर्माण दिखाकर चार साल पहले ही करीब दो लाख रुपए खर्च दिखा दिए गए। वर्ष 2021–22 में पंचायत निधि से बौलानौल-सैनखाला तक पाइपलाइन बिछाने का दावा किया गया, लेकिन हकीकत में यह पूरा काम कागज़ों में ही सिमटा रहा। ग्रामीणों का आरोप है कि ब्लॉक कार्यालय और पंचायत स्तर पर मिलीभगत से राशि बंदरबांट की भेंट चढ़ गई। पंचायत सचिव और बीडीओ से कई बार शिकायत करने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने से ग्रामीणों में गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है- हर बार जिलाधिकारी के पास जाने में हमें शर्मिंदगी महसूस होती है, लेकिन निरंकुश अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने का और कोई रास्ता नहीं बचा। नंदू पाण्डेय ने आरोप लगाया है कि पिछले पांच वर्षों में मनरेगा, पेयजल, घर-जल-नल, स्वच्छ भारत और अन्य सरकारी मदों में भारी अनियमितताएं हुई हैं। कई दस्तावेजों में जानबूझकर छेड़छाड़ कर घोटाले को छिपाने की कोशिश की गई है।
उधर, बीडीओ मामले पर मौन है और पंचायत मंत्री का कहना है कि ग्रामीणों के विरोध के चलते बगाड़ से सैनखाला तक पेयजल लाइन बनाई गई है, जबकि बगाड़-सैनखाला में पहले से ही पाइपलाइन मौजूद है। वहीं योजना में जेई द्वारा की गई माप-बही और पंचायत की बैठक का प्रस्ताव विभाग के दावों से मेल नहीं खाता, जिससे मामले पर और सवाल खड़े हो गए हैं।
अधिकारियों की चुप्पी और गायब कार्रवाई से निराश ग्रामीण अब एक बार फिर जिलाधिकारी के पास जाकर न्याय की गुहार लगाने की तैयारी कर चुके हैं।
जब योजनाएँ कागज़ों पर बहती हैं, प्यास हकीक़त में बढ़ती है।
कागज़ में पानी-जमीन पर प्यास।
घिंघारुकोट की पेयजल कहानी केवल एक गांव का दर्द नहीं, प्रशासनिक संवेदनहीनता का ताज़ा उदाहरण है। दो लाख की योजना फाइलों में पूरी हो गई, पाइपलाइन बिछ गई, पैसा खर्च दिखा दिया गया—पर गांव के नल आज भी सूखे हैं। यह घटना हमें बताती है कि भ्रष्टाचार जब जड़ों तक फैल जाता है तो विकास की हर बूंद सूख जाती है। पंचायत से लेकर ब्लॉक तक की चुप्पी इस बात का संकेत है कि जवाबदेही अब कागज़ों की तहों में दबी पड़ी है।
ग्रामीण हर बार जिलाधिकारी की चौखट पर पहुँचते हैं, लेकिन सवाल यह है-क्या प्रशासनिक तंत्र का निचला स्तर तमाशा देखने के लिए है? योजनाएं लिखने और धन आवंटित करने से विकास नहीं होता, उस पर ईमानदारी से क्रियान्वयन करने से होता है। अब समय है कि इस मामले को सिर्फ जांच का विषय न समझा जाए, बल्कि इसे उत्तराखंड के ग्रामीण प्रशासन की कार्यप्रणाली का आईना माना जाए।
क्योंकि - जब तक कागज़ों का पानी जमीन पर नहीं उतरेगा, तब तक प्यास सिर्फ बढ़ती ही रहेगी।
फोटो: मेरी पंचायत सरकारी ऐप से प्राप्त निर्माण योजना में हुए भुगतान का विवरण।