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चम्पावत समेत उत्तराखंड में तेंदुए बने चिंता का विषय, बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष शोध का विषय
चम्पावत। चम्पावत सहित पूरे उत्तराखंड में तेंदुओं की आबादी के नजदीक बढ़ती गतिविधियां आमजन के लिए चिंता का विषय बनती जा रही हैं। गांव-गांव, खेत-खलिहानों और आबादी के पास तेंदुओं की मौजूदगी अब केवल डर ही नहीं, बल्कि एक गंभीर शोध और नीति निर्धारण का विषय बन चुकी है।
विशेषज्ञों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इसका सबसे बड़ा कारण तेंदुए के प्राकृतिक आवास का लगातार सिमटना है। सड़क, भवन निर्माण, खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों के चलते जंगल अब टुकड़ों में बंट गए हैं, जिससे तेंदुओं की सुरक्षित आवाजाही बाधित हो रही है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में हिरण और जंगली सुअर जैसे प्राकृतिक शिकार की संख्या भी लगातार घट रही है। इसके पीछे जंगलों में लगने वाली आग, अवैध शिकार और बीमारियां प्रमुख कारण मानी जा रही हैं। भोजन की कमी के चलते तेंदुआ मजबूरी में आसान शिकार की तलाश में जंगल से बाहर निकल रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में बंधे मवेशी, बकरी और आवारा कुत्ते तेंदुए के लिए आसान शिकार बन रहे हैं। वहीं खेतों में काम करते लोग और बच्चे भी कई बार इसकी चपेट में आ जाते हैं। लगातार गांवों के आसपास आने से तेंदुए को जंगल से बाहर आने की आदत लगती जा रही है, जो भविष्य में और भी खतरा बढ़ा सकती है।
इसके अलावा जंगलों में बढ़ती ट्रैकिंग गतिविधियां, वाहनों की आवाजाही, रात का शोर, शराबखोरी और अवैध खनन भी तेंदुओं को उनके प्राकृतिक इलाकों से दूर धकेल रहा है। शांत और भोजन की तलाश में तेंदुआ गांवों की ओर रुख कर रहा है।
वन विभाग के अनुसार संरक्षण कानूनों के चलते तेंदुओं की संख्या में वृद्धि होना भी एक कारण है। हालांकि जंगलों का विस्तार उस अनुपात में नहीं हो पाया, जिसके परिणामस्वरूप मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं।
बचाव के जरूरी उपाय-
रात में अकेले बाहर न जाएं
बच्चों को सुबह-शाम अकेला न छोड़ें
मवेशियों को सुरक्षित बाड़ों में रखें
तेंदुआ दिखने पर तुरंत वन विभाग को सूचना दें
अफवाहों से बचें, सतर्कता और जागरूकता बनाए रखें
विशेषज्ञों का मानना है कि तेंदुए को खलनायक नहीं, बल्कि बदलते पर्यावरण और मानवीय दबाव का शिकार समझने की जरूरत है। समस्या का समाधान संतुलित विकास, जंगल संरक्षण और जन-जागरूकता से ही संभव है।