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कांग्रेस को भारी पड़ सकती है जमीनी नेता हरीश रावत की अनदेखी। पार्टी के युवा नेताओं के लिए कहा मिलता है ऐसा तपा - तपाया नेतृत्व, जिसकी गहन सूज बुझ की परिपक्वता का विरोधी भी मनाते हैं लोहा, 76 की उम्र में भी जनता के दिलों में बसे हरदा, गांव-गांव की पकड़ और संघर्षशील छवि आज भी कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत।
चम्पावत। पहाड़ की राजनीति में गांव-गांव से उठकर संसद तक अपनी मजबूत पहचान बनाने वाले हरीश रावत आज भी आम जनता के दिलों में बसे हुए हैं। भले ही वे जीवन के 76 बसंत पार कर चुके हों, लेकिन उनकी सक्रियता, जनसंपर्क और जमीन से जुड़ी राजनीति आज भी उन्हें कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली चेहरों में खड़ा करती है। नगर से लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक लोग आज भी उन्हें कांग्रेस का पर्याय मानते हैं। एक समय ऐसा था जब श्री रावत पोस्टकार्ड और चिट्ठियों के माध्यम से आम जनता से संवाद बनाए रखते थे, और आज भी कई लोग उन पत्रों को सहेजकर रखते हैं जो उनके मजबूत जनसंपर्क और संवेदनशील नेतृत्व का जीवंत प्रमाण हैं। पहाड़ की दुर्गम परिस्थितियों में लंबी पैदल यात्राएं कर लोगों के सुख-दुख में शामिल होना उनकी पहचान रही है। 1980 में पहली बार सांसद बनने के बाद उन्होंने संसद में उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दों को जिस मजबूती से उठाया, उसने उन्हें एक कुशल और प्रभावशाली पार्लियामेंटेरियन के रूप में स्थापित किया। उस दौर में उनकी संसद में की गई बहसों को सुनने के लिए लोग घरों में रेडियो तक रखते थे।
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय सीट से आगे बढ़कर वे पूरे उत्तराखंड की आवाज बन गए। गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक उनकी पकड़ और विषयों की गहरी समझ ने लोगों को प्रभावित किया। उनकी खासियत रही कि उन्होंने हमेशा राजनीतिक विरोधियों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार किया, जिससे उन्हें हर दल में आदर मिला। वहीं, वर्तमान समय में कांग्रेस के कई नए नेता अपने-अपने जिलों तक ही सीमित नजर आते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रियता तो दिखती है, लेकिन जमीनी स्तर पर पहचान और जनसंपर्क की कमी साफ झलकती है। यही कारण है कि आम जनता आज भी पुराने नेताओं, खासकर हरीश रावत के नेतृत्व को याद करती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस ने ऐसे जमीनी और अनुभवी नेता की अनदेखी की, तो आने वाले समय में उसे चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है। जनता के बीच मजबूत पकड़ और भरोसे की जो पूंजी श्री रावत ने वर्षों में बनाई है, वह आज भी कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है। हरीश रावत ने ऐसे गाड़ गधेरों का पानी पिया है की आज भी उनके पहाड़ी पैदल रास्तों में चलने का मुकाबला उत्तराखंड का कोई उम्रदराज कांग्रेस नेता नहीं कर सकता है। यह बात अलग है कि पूर्व काबिना मंत्री श्री रावत के निकट सहयोगी महेन्द्र सिंह महरा आज भी मानते हैं कि श्री रावत की कार्य क्षमता, ढृढ इच्छा शक्ति व गहन सूज बूझ में उत्तराखंड के परिवेश को समझने की उनमें जो झमता है, उसका लाभ पार्टी की नई पीढ़ी को उठाना चाहिए। शेर भले ही उम्र दराज हो जाता है लेकिन उसकी प्रकृति व संस्कृति नहीं बदलतीं है।
फोटो - ऐसे उबड़-खाबड़ पर्वतीय रास्तों में चलना हरीश रावत की फिदरत रहीं हैं।
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