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मैंने बेटा खो दिया, कोई और न खोए- सिस्टम पर सवाल उठाता एक फौजी पिता का दर्द
चमोली/बागेश्वर | जुलाई 2025
उत्तराखंड के चमोली जिले के चिडंगा गांव निवासी और वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में तैनात सैनिक दिनेश चंद्र के जीवन में वह दिन काले अध्याय की तरह दर्ज हो गया, जब उनके डेढ़ साल के बेटे शुभांशु जोशी की इलाज न मिल पाने के कारण मौत हो गई। इस त्रासदी के बाद दिनेश चंद्र ने सोशल मीडिया पर एक मार्मिक वीडियो संदेश साझा करते हुए सिस्टम की लापरवाही पर गहरा आक्रोश जताया।
बेटे की हालत बिगड़ी, लेकिन अस्पतालों ने नहीं दी मदद
दिनेश की पत्नी और मां शुभांशु को लेकर ग्वालदम अस्पताल पहुंचीं, जहां उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल पाया। इसके बाद बच्चे को एक के बाद एक पांच अस्पतालों में रेफर किया गया, लेकिन इलाज शुरू होने से पहले ही मासूम की मौत हो गई।
एंबुलेंस समय पर क्यों नहीं मिली?
वीडियो में दिनेश चंद्र ने कहा -
सरकारें बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि समय पर एक एंबुलेंस तक नहीं मिलती। अगर इलाज समय पर मिल गया होता, तो शायद मेरा बेटा आज जीवित होता।
उन्होंने बागेश्वर जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब उन्होंने इमरजेंसी में तैनात डॉ. भूपेंद्र घटियाल से संपर्क किया, तो उन्हें न सिर्फ संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, बल्कि अभद्र व्यवहार का भी सामना करना पड़ा।
उठते सवाल
1. एक मासूम को पांच अस्पतालों में क्यों भटकाया गया? क्या स्थानीय अस्पताल प्राथमिक इलाज देने में भी असमर्थ हैं?
2. एंबुलेंस सेवा इतनी लचर क्यों? आपातकालीन स्थितियों के लिए वैकल्पिक इंतज़ाम क्यों नहीं रहते?
3. अस्पताल स्टाफ का असंवेदनशील व्यवहार क्यों? ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?
4. सीएमएस ने कहा, 30 मिनट में 108 न पहुंचे तो दूसरी एंबुलेंस भेजते हैं, तो उस दिन क्यों नहीं भेजी गई?
5. क्या जिलाधिकारी के फोन के बिना इलाज या वाहन नहीं मिल सकता?
प्रशासनिक पक्ष
डॉ. तपन कुमार शर्मा (सीएमएस, बागेश्वर):
108 सेवा जिला अस्पताल के अधीन नहीं है। हमारे वाहन चालकों को अलर्ट मोड पर रखा गया है। अगर 30 मिनट में 108 नहीं पहुंचती तो हमारी एंबुलेंस जाती है। शिकायत मिलने पर जांच करेंगे।
डॉ. कुमार आदित्य तिवारी (सीएमओ, बागेश्वर):
वायरल वीडियो में लगे आरोपों की जांच की जाएगी। 108 सेवा प्रभारी को नोटिस भेजा गया है। लिखित शिकायत आने पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
यह सिर्फ एक पिता का दुख नहीं, एक तंत्र की नाकामी है
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि राज्य के स्वास्थ्य ढांचे की विफलता की प्रतीक है। एक सैनिक पिता जिसने देश की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया, उसे अपने बेटे के लिए एक एंबुलेंस के लिए गुहार लगानी पड़ी, यह न केवल संवेदनहीनता है, बल्कि व्यवस्थागत अपराध जैसा है।
न्याय और सुधार की मांग
परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषियों पर कार्रवाई और 108 सेवा समेत आपात चिकित्सा व्यवस्था को तुरंत मजबूत किया जाना आवश्यक है, ताकि शुभांशु जैसी कोई और मासूम जान लापरवाही की बलि न चढ़े।