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30 साल बाद भी पहचान को तरस रहे 17 राज्य आंदोलनकारी, प्रशासन को दी चेतावनी।
गंगोलीहाट। पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले गंगोलीहाट तहसील के 17 आंदोलनकारी आज भी सरकारी मान्यता का इंतजार कर रहे हैं। राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले इन आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्होंने आंदोलन के दौरान लाठियां खाईं, मुकदमे झेले और जेल तक गए, लेकिन तीन दशक बीत जाने के बाद भी उन्हें आधिकारिक रूप से ‘राज्य आंदोलनकारी’ का दर्जा नहीं मिल पाया है।
सोमवार को आंदोलनकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उपजिलाधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी को ज्ञापन भेजकर अपनी नाराजगी जताई। ज्ञापन में बताया गया कि 20 अगस्त 1994 को गंगोलीहाट में राज्य आंदोलन के दौरान हुए प्रदर्शन के बाद थाना बेरीनाग में श्यामचरण उप्रेती समेत 18 लोगों पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि इसी मुकदमे के आधार पर मुख्य आरोपी श्यामचरण उप्रेती को सरकार द्वारा राज्य आंदोलनकारी घोषित कर दिया गया, जबकि उनके साथ संघर्ष करने वाले अन्य 17 लोगों को अब तक इस सूची में शामिल नहीं किया गया।
स्थानीय आंदोलनकारी प्यारे लाल शाह ने कहा कि जब मुकदमा और आंदोलन एक ही था, तो सरकार का पैमाना अलग-अलग कैसे हो सकता है। उन्होंने इसे आंदोलनकारियों के संघर्ष का अपमान बताया।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि 1994 की इस घटना की निंदा तत्कालीन उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी हुई थी। बाद में 12 अक्टूबर 1995 को शासन ने जनहित में मुकदमा वापस ले लिया था, जो इस बात का प्रमाण है कि मामला राज्य आंदोलन से जुड़ा हुआ था।
आंदोलनकारियों ने मांग की है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर शेष 17 लोगों के चिन्हीकरण की प्रक्रिया जल्द पूरी कर उन्हें राज्य आंदोलनकारी का दर्जा दिया जाए।
ज्ञापन सौंपने वालों में मुकेश रावल, रणजीत सिंह, प्यारे लाल साह, दिनेश बिष्ट, भगवत लाल साह, शेखर लाल साह, राजेंद्र सिंह और कमला धानिक समेत कई लोग शामिल रहे।
प्रशासन की ओर से उपजिलाधिकारी कार्यालय ने ज्ञापन को उचित कार्रवाई के लिए जिला स्तरीय चिन्हीकरण समिति को भेजने का आश्वासन दिया है। अब आंदोलनकारियों की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है।