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पंचायत चुनाव की गर्मी में गांवों में रिश्तों की ठंडक, वोट की दीवार बन रही चिंता की दीवार
चंपावत जनपद / ग्रामीण संवाददाता
पंचायत चुनाव अपने चरम पर है। गांवों में चहल-पहल, प्रचार-प्रसार और चौपालों पर चर्चा का माहौल है। लेकिन इसी के साथ एक और गंभीर बात सामने आ रही है - चुनाव के कारण परिवारों और रिश्तों में बढ़ती रंजिश और मतभेद।
गांव भकुनिया की एक कहानी आज कई गांवों की हकीकत बन चुकी है। रामदीन और हरिराम, दो सगे भाई जो एक ही आंगन में रहते थे, अब पंचायत चुनाव के चलते एक-दूसरे से अलग हो चुके हैं। एक ने अपने साले को समर्थन दिया, दूसरे ने पुराने मित्र का। यह बात धीरे-धीरे घर के अंदर कलह का कारण बन गई। बहसें बढ़ीं, बातचीत बंद हुई, बच्चों में झगड़े शुरू हुए और यहां तक कि रसोई तक अलग हो गई।
गांव के लोग इस बंटवारे को देख रहे हैं। सभी जानते हैं कि यह सिर्फ दो लोगों की कहानी नहीं है, बल्कि चुनाव ने पूरे गांव में लोगों को गुटों में बांट दिया है। जिन रिश्तों में कभी अपनापन था, वहां अब शक, ताना और कटुता है।
चुनाव की चर्चा अब लोगों को जोड़ने की बजाय तोड़ रही है। हर तरफ जीत-हार की बहस है लेकिन इसके पीछे जो सामाजिक खामोशी और मानसिक दूरी बन रही है, वह कहीं ज्यादा खतरनाक है।
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वह इस दिशा में गंभीरता से ध्यान दे। पंचायत चुनाव लोकतंत्र की जड़ है, लेकिन यदि इसकी जड़ें समाज में विघटन लाने लगें, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।
जरूरत है कि गांव-गांव में सौहार्द और आपसी समझ का वातावरण बनाया जाए। संवाद शिविरों, जन जागरूकता अभियानों और पंचायत स्तर पर सामुदायिक बैठकों के माध्यम से रिश्तों को बचाने का प्रयास हो।
क्या पांच साल के लिए दिया गया वोट 50 साल पुराने रिश्तों को तोड़ सकता है?
क्या पंचायत चुनाव किसी की प्रतिष्ठा के नाम पर समाज में फूट डालने का जरिया बनता जा रहा है?
समाज को यह सोचने की जरूरत है कि विकास के लिए किया गया चुनाव, यदि अपनों से दूर कर दे तो इसका क्या लाभ?
हमारा संदेश
वोट जरूर करें, लेकिन रिश्तों को न तोड़ें।
लोकतंत्र का मतलब केवल जीत-हार नहीं, बल्कि मतभेदों में भी सम्मान बनाए रखना है।
पंचायतें आती-जाती हैं, लेकिन परिवार और समाज हमेशा साथ रहते हैं।
रिपोर्ट - मीडिया डेस्क, चंपावत न्यूज़ नेटवर्क
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