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युवाओं सावधान: बेरोज़गारों के मंच को राष्ट्रविरोधी ताक़तों से बचाना होगा, भर्ती घोटालों के धंधेबाज़ फिर सक्रिय, सतर्क रहें युवा
देहरादून।
उत्तराखंड में भर्ती घोटालों और नकल माफ़िया के खिलाफ लड़ाई एक बार फिर नए मोड़ पर है। बेरोज़गार युवाओं के आंदोलन के बीच प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज है। इस बीच, युवाओं को आगाह किया गया है कि कहीं हितैषी बनकर सामने आने वाले वही लोग न हों, जिन्होंने भर्ती घोटालों के जरिए युवाओं का भविष्य बर्बाद किया।
भ्रष्टाचार का डिफॉल्ट सिस्टम
राज्य का गठन विकास और युवाओं के सुरक्षित भविष्य के सपनों के साथ हुआ था, परंतु वास्तविकता इससे अलग रही। उत्तराखंड बनने के बाद से लेकर आज तक भर्ती परीक्षाएं नकल और धांधली के शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाईं। भर्ती घोटाला अब सिस्टम की बीमारी बन चुका है।
पुराने पन्नों से काला इतिहास
एन.डी. तिवारी के शासनकाल में दरोगा भर्ती कांड ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था। अच्छे अंक लाने वालों को इंटरव्यू में फेल कर दिया गया और योग्य उम्मीदवार वर्षों तक न्यायालय के चक्कर काटते रहे। इसी दौर में हाकम सिंह जैसे चेहरे भर्ती नेटवर्क का हिस्सा बनकर उभरे।
पटवारी भर्ती कांड ने तो सीमाएं लांघ दीं - ऐसे उम्मीदवारों को नौकरी दे दी गई जिन्होंने आवेदन तक नहीं भरा था। यह युवाओं के अधिकारों का सीधा अपहरण था।
जल निगम और तकनीकी संस्थानों की कहानी
2005 और 2007 में पेयजल निगम की परीक्षाओं के परिणामों ने सबको चौंका दिया। एक ही कॉलेज के छात्रों का सामूहिक चयन, आरक्षित पदों पर बाहरी राज्यों को नौकरी -सब कुछ योजनाबद्ध लग रहा था। कुछ इंजीनियर जो पहले फेल हुए थे, दोबारा पास हो गए जबकि पहले से कार्यरत इंजीनियर फेल घोषित कर दिए गए।
लोक सेवा आयोग भी अछूता नहीं रहा
ऊर्जा निगमों और अन्य आयोगों की भर्तियों में भी अनियमितताएं खुलकर सामने आईं। कमजोर डिग्री धारकों को नौकरी मिली, जबकि योग्य उम्मीदवार बाहर रह गए। किसी भी सरकार ने ठोस कार्रवाई नहीं की।
यूकेएसएसएससी का पतन
2015 में उम्मीद जगी जब उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) का गठन हुआ। ईमानदार अधिकारी आर.बी.एस. रावत को जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन जल्द ही यह आयोग भी भ्रष्टाचार के दलदल में धँस गया। हाकम सिंह गैंग यहीं से सक्रिय हुआ और सहायक लेखाकार से ग्राम विकास अधिकारी तक हर भर्ती विवादों में घिर गई।
2021-22: जब टूटा माफ़िया का साम्राज्य
प्रदेश में पहली बार सख्ती हुई। हाकम सिंह समेत सौ से अधिक लोग गिरफ्तार हुए। कई अफसरों और आयोग के अध्यक्ष तक को जेल जाना पड़ा। इसके बाद नकल विरोधी कानून लागू हुआ और युवाओं का भरोसा लौटने लगा। मेहनत करने वाले गरीब घरों के बच्चे चयनित होने लगे। परंतु यह भरोसा स्थायी नहीं रहा। हाल ही में एक बार फिर हाकम का नया चेहरा उजागर हुआ और सिस्टम की सड़ांध सामने आ गई।
बेरोज़गारों के लिए सबक
इतिहास गवाह है - जो भी हितैषी बनकर आगे आए, वे अक्सर इस धंधे का हिस्सा निकले। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे अपने आंदोलन को किसी राजनीतिक या राष्ट्रविरोधी एजेंडे से दूर रखें। परेड ग्राउंड जैसे मंच केवल नकल और धांधली के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनें, किसी राजनीतिक विचारधारा का नहीं।
सजगता ही शक्ति है
उत्तराखंड के युवाओं ने पहले भी अपनी एकजुटता से सरकारों को झुकाया है। आज फिर यह जरूरी है कि वे अपनी आवाज को सही दिशा दें और किसी के बहकावे में न आएं। यह लड़ाई अगर ईमानदारी से लड़ी गई तो परेड ग्राउंड से उठी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय और पारदर्शिता का प्रतीक बन जाएगी।