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उत्तराखंड की सिल्वर जुबली पर जनता को गुगली, अफसर बने गोल्डन, तो नेता डायमंड
चम्पावत, 09 नवंबर 2025 (दिनेश चंद्र पांडेय)
राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर जहां सरकारें विकास का जश्न मना रही हैं, वहीं जनता सवाल पूछ रही है कि पच्चीस साल बाद भी पहाड़ का दर्द वही क्यों है।
राज्य की सिल्वर जुबली पर पत्रकार दिनेश चंद्र पांडेय द्वारा किए गए जनमंथन में सामने आया कि आंकड़ों में उत्तराखंड ने तरक्की की है, लेकिन इसका असली लाभ नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों तक ही सीमित रहा। आम जनता अब भी रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है।
विकास के आंकड़े, जनता के सवाल
राज्य का बजट 3 हजार करोड़ से बढ़कर 1 लाख करोड़ हो गया, जीडीपी में 26 गुना वृद्धि हुई और साक्षरता दर 88 प्रतिशत तक पहुंची।
फिर भी पलायन, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियां जस की तस हैं।
1700 से अधिक गांव खाली हो चुके हैं और 1671 स्कूल बंद हो गए हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत ऐसी है कि 608 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली हैं।
सियासत और सिस्टम पर सवाल
विधानसभा के विशेष सत्र में खुद विपक्ष ने स्वीकार किया कि विकास के नाम पर लालफीताशाही बेलगाम है।
उपनेता प्रतिपक्ष भूवन कापड़ी ने विधायक निधि में 15 प्रतिशत कमीशन की बात कहकर भ्रष्टाचार पर निशाना साधा।
आम जनता के मुताबिक, राज्य में अब अफसर सत्ताधारी दलों के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं।
मीडिया और आंदोलनकारी भी निशाने पर
सिल्वर जुबली के मौके पर तलवाचाट मिडिया और चारणभाटगिरी करने वाले कुछ आंदोलनकारियों पर भी जनता का गुस्सा फूटा।
लोगों ने कहा कि आज मीडिया का एक वर्ग सत्ता का गुणगान कर धनपानी बटोरने में जुटा है।
नेताओं की कमी और जनभावना
लोगों का मानना है कि आज राज्य को एन.डी. तिवारी, बी.सी. खंडूरी, विपिन त्रिपाठी और काशी सिंह ऐरी जैसी सोच वाले जननेताओं की दरकार है, जो पहाड़ के हित में ईमानदारी से नीति बना सकें, न कि केवल घोषणाओं तक सीमित रहें।
निष्कर्ष: जश्न के बीच सच्चाई का आईना
उत्तराखंड के पास अब सड़कों, रेल, हवाई अड्डों और धार्मिक पर्यटन का मजबूत ढांचा है, लेकिन गांवों में डोली से अस्पताल पहुंचने की मजबूरी अभी भी कायम है।
राज्य का कर्ज 4500 करोड़ से बढ़कर 90 हजार करोड़ पहुंच गया है।
जनता पूछ रही है - क्या यही वह उत्तराखंड है, जिसके लिए हजारों आंदोलनकारी जेल गए, लाठियां खाईं और बलिदान दिया।
जब तक हर हाथ को काम और हर खेत को सम्मान की नीति नहीं बनेगी, तब तक उत्तराखंड की सिल्वर जुबली केवल सत्ता का उत्सव और जनता के लिए गुगली बनी रहेगी।