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डॉक्टर्स डे स्पेशल, सेवा को धर्म मानने वाले डॉक्टरों ने रचा मानवता का इतिहास
लोहाघाट, 1 जुलाई।
डॉक्टर केवल इलाज करने वाले नहीं, बल्कि पीड़ितों के लिए आशा की किरण होते हैं। आधुनिक दौर में जब चिकित्सा क्षेत्र अक्सर व्यावसायिकता के दायरे में आ गया है, तब भी कुछ डॉक्टर ऐसे हैं जो सेवा, समर्पण और संवेदना के साथ मानवता की मिसाल पेश कर रहे हैं। डॉक्टर्स डे के अवसर पर लोहाघाट क्षेत्र के ऐसे ही समर्पित चिकित्सकों की प्रेरणादायक कहानियां सामने आई हैं।
हृदय की सेवा में समर्पित डॉ. के. के. पुनेठा
लोहाघाट निवासी और चंपावत जिले के जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के. के. पुनेठा ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि सेवा की भावना ही सच्चा धर्म है। उन्हें बार-बार दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों से बड़े निजी अस्पतालों में मोटे वेतन के साथ काम करने के प्रस्ताव मिलते हैं, लेकिन उन्होंने अपने क्षेत्र और अपनी जनता के बीच रहकर सेवा करना ही चुना।
उनके ताऊ हरिकृष्ण पुनेठा, जो एक समय सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर थे, ने उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रेरित किया। आज डॉ. पुनेठा को इस क्षेत्र का इतना गहन अनुभव है कि उनकी सलाह और दवा बड़े-बड़े हृदय रोग विशेषज्ञों के बराबर मानी जाती है।
कुमाऊं भर से रोगी उनके पास परामर्श और इलाज के लिए पहुंचते हैं, और आज लोहाघाट की पहचान डॉ. पुनेठा के नाम से होती है।
होम्योपैथी की पहचान बनीं डॉ. उर्मिला बिष्ट
लोहाघाट उप जिला चिकित्सालय की होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी डॉ. उर्मिला बिष्ट ने अपने आत्मीय व्यवहार, गहन अध्ययन और सरल उपचार से जनता का भरोसा जीता है। मात्र दो रुपये की पर्ची में वे रोगियों को सटीक इलाज देती हैं।
महिला रोगियों में उनका विशेष सम्मान है और लोग टनकपुर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा तक से उनके पास इलाज कराने आते हैं। उनका मानना है कि रोगी को केवल दवा से नहीं, आत्मीयता और विश्वास से भी ठीक किया जा सकता है।
निशुल्क सेवा का प्रतीक बने डॉ. डी. एस. दुबे
पांडिचेरी से आए प्रसिद्ध निश्चेतक डॉ. डी. एस. दुबे पिछले 17 वर्षों से अद्वैत आश्रम मायावती के धर्मार्थ चिकित्सालय में निशुल्क सेवा दे रहे हैं। सर्जन टीम के लिए वे संबल हैं और उनकी मौजूदगी से कई जटिल सर्जरी संभव हो पाती हैं।
डॉ. दुबे कहते हैं, पैसा तो कहीं भी मिल सकता है, लेकिन मायावती में जो आत्मिक संतोष मिलता है, वह अमूल्य है।
अस्पताल प्रबंधक स्वामी एकदेवानंद जी महाराज ने उन्हें महामानव की संज्ञा दी है और कहा है कि डॉ. दुबे जैसे सेवाभावी चिकित्सक समाज के लिए वरदान हैं।
डॉ. मंजीत सिंह
जहां अधिकतर लोग सुविधाजनक स्थानों पर नौकरी करना चाहते हैं, वहीं डॉ. मंजीत सिंह ने अपने चिकित्सकीय जीवन की शुरुआत टांड जैसे दुर्गम क्षेत्र में सेवा देकर यह साबित कर दिया कि उनके लिए चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम है।
वर्तमान में बाराकोट के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी के रूप में कार्यरत डॉ. मंजीत सिंह लोहाघाट और बाराकोट दोनों क्षेत्रों में हर जरूरतमंद को यथासंभव मदद पहुंचाने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। वे न केवल अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र में सेवा करते हैं, बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों में भी व्यक्तिगत रूप से आगे बढ़कर मरीजों की मदद करते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, डॉ. मंजीत का व्यवहार, संवेदनशीलता और सेवा भाव उन्हें बाकी डॉक्टरों से अलग बनाता है। दुर्गम क्षेत्र की चुनौतियों के बावजूद उनका जज्बा और समर्पण सराहनीय है।
डॉ. मंजीत सिंह जैसे डॉक्टर ही डॉक्टर्स डे की सच्ची प्रेरणा हैं, जो बिना प्रचार के चुपचाप अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं और लोगों के जीवन में उम्मीद की रोशनी बने हुए हैं।
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